महाकाल मंदिर में लगाए पत्रकारों ने मुर्दाबाद के नारे..

उज्जैन (राजेंद्र पुरोहित)। पत्रकार अपने को तोप- तमंचे से कम नहीं समझता....जिसे सुविधा मिल गई.... जुगाड़ हो गया.... फिर उसे दूसरे से कोई सरकार नहीं..... सुविधाभोगी की आवाज बदली सी ही रहती है.... हताश-परेशान की आवाज और उसके सूर बदले-बदले रहते हैं.... यह हमारी बिरादरी की बात है.... इसे हम ही जान सकते हैं.... इसी का फायदा और कमजोरी का लाभ अंग्रेजों ने भी उठाया.... और सत्ताधारी भी उठा रहा है..... पत्रकार जमात हो या अन्य जमात..... उनमें फूट डालो.... संगठित नहीं होने दो.....टुकड़े-टुकड़े गैंग में तब्दील कर दो..... टुकड़े टुकड़े गैंग कभी एक नहीं होंगे..... और एक दूसरे पर भिड़ पड़ेंगे..... वैचारिक युद्ध करते रहेंगे.... पहले तो निरक्षरों को...  और फिर असंगठितों पर कब्जा किया..... अब (बौद्धिक कौम) पत्रकारों को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया..... सत्ताधीशों के बाद नौकरशाहों ने भी यही अस्त्र पत्रकार बिरादरी पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया..... कौवे की तरह चतुर/चालाक और बौद्धिक कौम (पत्रकार) भी आर्थिक एवं स्वार्थ के चक्कर में फंस गई....अब ये भी नहीं बचे हैं.... इतनी भूगोल-भूमिका बनाने के पीछे यही संकेत और उद्देश्य है कि नौकरशाहों की जाल में पत्रकार बिरादरी बुरी तरह से फंस गई है.... वे पहले आपस में लड़वाते हैं.... उनकी ही कमजोरी का लाभ उठाते हैं.... यही कारण है कि उज्जैन के पत्रकारों का दबदबा समाप्त हो गया है.... टुकड़े-टुकड़े गैंग में तब्दील हो गए हैं.... अब तानाशाहों अर्थात नौकरशाहों को कोई डर नहीं..... उन्होंने स्वार्थरूपी नब्ज पकड़ ली है.... आज उज्जैन का नौकरशाह तानाशाही पर है.... ऐसी दुर्गति अंग्रेजों के काल में कभी पत्रकारों की नहीं हुई..... वह दुर्गति इस लोकतंत्र और प्रजातंत्र में हो रही है..... हम टुकुर-टुकुर देख रहे हैं..... स्वाभिमान को पलीता लगा रहे हैं...... पत्रकारिता की अस्मिता को तार-तार कर रहे हैं...... अब साफ हो गया है कि पत्रकारिता में कोई नियम/सिद्धांत, आचार संहिता नहीं है..... हर पत्रकार की अपनी आचार संहिता हैं....और अपने हिसाब से नियमों और सिद्धांतों को स्वीकार कर लिया है..... अब पत्रकारों को कलम चलाने के स्थान पर मुर्दाबाद नारे लगाने के लिए विवश/मजबूर होना पड़ रहा है.....

क्यों लगे महाकाल में मुर्दाबाद के नारे....

 कलमकारों को जिला/ पुलिस प्रशासन के खिलाफ मुर्दाबाद नारे लगाना पड़े.....इससे बढ़कर शर्म की कोई बात नहीं..... सुप्रीम कोर्ट के न्यायविदों को अपनी बात कहने के लिए पत्रकार वार्ता बुलाना पड़ी.... और अपनी बात कही.... वे चाहते तो अनशन/हड़ताल और मुर्दाबाद के नारे लगा सकते थे... पर उन्होंने ऐसा नहीं किया..... पत्रकारों के समक्ष अपनी बात रखी.... सरकार हिल गई....  रिजेक्टेड सिस्टम में खलबली मच गई.....उज्जैन के पत्रकारों के सामने ऐसी क्या मजबूरी आ गई थी कि उन्हें महाकाल मंदिर में प्रशासन मुर्दाबाद के नारे लगाना पड़े..... क्या यह पत्रकारिता के सिद्धांत में है..... जब आप सर्वोच्च व्यक्ति की बात सुनते हैं.... और उस पर फैसले होते हैं.....फिर पत्रकारों को इतना नीचे गिरने की क्या जरूरत थी...... इसके पीछे अपने संगठन और पत्रकार नेताओं की क्या रणनीति थीं....यदि थी..... तो फिर मुर्दाबाद नारों के क्या परिणाम निकले..... हमारे वरिष्ठ यही कहते हैं कि पत्रकार अपनी गरिमा, अपने अस्तित्व और स्वाभिमान की रक्षा करें.... ऐसा कोई आचरण नहीं करे कि उससे पत्रकारिता पर कोई लांछन/दाग लगे..... मुर्दाबाद और नारेबाजी का काम आम आदमी भी कर रहा है..... तो फिर चौथा स्तंभ/चौथा पाया होने का दंभ भरते हैं.... क्या चौथे स्तंभ को कोई अतिरिक्त अधिकार है..... क्या उनके लिए अलग से नियम है..... फिर ऐसी गुस्ताखी क्यों करते हैं...... क्यों अपनी गरिमा को गिराते हैं.... हाल ही में एक वरिष्ठ पत्रकार ने इसी प्रसंग पर पत्रकारों के लिए  "तोकोलाजिस्ट" शब्द का इस्तेमाल किया..... इसका हिंदी/अंग्रेजी मिश्रित यही अर्थ मान सकते हैं कि हम सत्ताधीशों/नौकरशाहों/अफसरों की झूठी प्रशंसा करना बंद करो..... भाट- चारण की तरह गुणगान बंद करो......
 बात साफ है.... पत्रकारों को कलेक्टर ने आश्वस्त कर दिया कि नागपंचमी पर महाकाल मंदिर परिसर स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर में पत्रकारों और उनके परिवारों के लिए दर्शन की सुप्रबंध व्यवस्था की जाएगी.... पत्रकार अपने परिवार सहित मंदिर पहुंचे...  वहां घंटो खड़े रहे..... व्यवस्थाओं में लगाए गए लोग नहीं मिले..... कलेक्टर नहीं आए..... कलेक्टर ने सुनी भी नहीं..... किसने मोबाइल लगाया या नहीं लगाया.... इसकी पुष्टि नहीं हुई..... कलेक्टर ने क्या फोन नहीं उठाया.... यदि उठाया तो उनका क्या जवाब रहा.....ये सारे यक्ष प्रश्न हैं.... किन पत्रकारों के समक्ष यह आश्वासन दिया था.... पत्रकार, अपने परिवार सहित आए.....क्या कलेक्टर अपने आश्वासन और निर्देश के बाद बदल गए हैं..... या पत्रकारों को बेवकूफ बनाया है..... पत्रकार परिवार घंटों परेशान रहे.....

 किस्से ये भी आ रहे हैं कि पत्रकारों को नागपंचमी के कवरेज में काफी दिक्कतें आई.... कोई बैरिकेट्स कूदकर गया... किसी को सुरक्षाकर्मी से बहस करना पड़ी..... कवरेज करने से रोका गया..... जब प्रशासन सब कुछ कर सकता है तो फिर कवरेज की क्या जरूरत..... क्यों उनके सहयोगी बने.....? अव्यवस्थाओं पर कलम क्यों नहीं चलाते..... दूसरी और यह बात भी सामने आई है कि जिला और पुलिस प्रशासन सहित अन्य विभागों के अधिकारियों और उनके परिवारों के लिए महाकाल के विशेष द्वार (गेट) खोल दिए गए.... उनके दर्शन की चाक-चौबंद व्यवस्था कराई... बड़ी संख्या में नौकरशाहों के परिवारों ने दर्शन लाभ लिए.... इधर पत्रकारों के परिवार बुरी तरह से परेशान होते रहे.... अधिकारियों की विसंगतिपूर्ण और दोहरी व्यवस्था क्यों रही....
बताते हैं कि इसी बीच एक पूर्व मंत्री/विधायक ने अपने स्तर पर अपने लोगों को दर्शन कराएं.... उन्होंने साफ किया कि मंदिर में वीआईपी कल्चर बंद होना चाहिए....एक स्थान पर धरना स्टाइल में अपनी ताकत दिखाकर ताले खुलवाए...

पत्रकारों को अपनी ताकत का आकलन/मूल्यांकन स्वयं करना होगा.... यदि किसी अधिकारी ने आश्वस्त किया है तो फिर वे कैसे पलट सकते हैं.... पत्रकारों, अब प्रशासनिक अधिकारियों की चाटूकारिता बंद करो.... वर्ना आने वाले समय में और भी कष्ट उठाना पड़ सकते हैं..... शायद कवरेज के लिए आपको मौका भी नहीं मिले..... बस....चौथे स्तंभ होने का दम भरते रहों..... ?

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