इंटरनेशनल अफ्रीकी देश रवांडा के कैथोलिक चर्च के बिशप फिलिप रुकांबा ने रवांडा नरसंहार पर माफी मांगी है। रविवार को उन्होंने सार्वजनिक रूप से माना कि नरसंहार को बढ़ावा देने में चर्च की भी भूमिका थी। रवांडा नरसंहार अप्रैल 1994 में हुआ था, जिसके बाद 100 दिन में ही पूरे देश में करीब 10 लाख लोगों की मौत हुई। राष्ट्रपति की मौत के बाद शुरू हुआ था नरसंहार...- 6 अप्रैल 1994 में रवांडा के प्रेसिडेंट हेबिअरिमाना और बुरंडियन के प्रेसिडेंटसिप्रेन की हवाई जहाज पर बोडिर्ंग के दौरान हत्या कर दी गई थी। - उस वक्त हुतु समुदाय के सरकार थी और उन्हें लगा कि यह हत्या तुत्सी समुदाय के लोगों ने की है। - इनकी हत्या के दूसरे ही दिन पूरे देश में नरसंहार शुरू हो गया। हुतु सरकार ने अपने सैनिक भी इसमें शामिल हो गए।- क्योंकि तत्कालीन हुतु सरकार ने आम जनता के साथ अपने सैनिकों को भी तुत्सी समुदाय के लोगों को मारने का आदेश दिया। - इस नरसंहार में कुछ ही दिन में 80000 से भी ज्यादा तुत्सी समुदाय के लोगों को मार दिया गया था। कई देश छोड़कर भाग गए थे।- नरसंहार करीब 100 दिन तक चला, जिसमें मौत का आंकड़ा 10 लाख के करीब पहुंचा था। इसमें सबसे ज्यादा मरने वालों की संख तुत्सी समुदाय के लोगों की ही थी।- पहले भी इन दोनों समुदायों के बीच वर्चस्व को लेकर हिंसक झड़प होती रही थीं, जो इस भयानक नरसंहार के रूप में सामने आई।मासूम बच्चों तक को काटकर फेंक दिया गया था सड़कों पर- इस नरसंहार ने रवांडा को बर्बाद कर दिया था। लाखों परिवार उजड़ गए थे।
- यह इतना भयानक नरसंहार था कि आज भी यहां के लोग उस हादसे को याद कर सहम उठते हैं। - इसका सबसे ज्यादा शिकार बच्चे और महिलाएं बनीं। हजारों महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ। - महिला-पुरुष तो सही, नरसंहार में मासूम बच्चों तक को नहीं बख्शा गया था। बच्चों को भी काटकर सड़कों पर फेंक दिया गया था।- तुत्सी समुदाय के लोगों की निर्मम हत्या के बाद उनके घर लूट लिए गए थे। इसके बाद घरों में ही उनके शव जला दिए गए थे।
बेल्जियम ने कर लिया था देश पर कब्जा- 1918 से पहले रवांडा के हालात सामान्य थे। देश गरीब था, लेकिन हिंसा नहीं थी। - 1918 में बेल्जियम ने रवांडा पर कब्जा कर लिया। इसके बाद यहां जनगणना कराई गई।- बेल्जियम की सरकार ने रवांडा के लोगों की पहचान के लिए पहचान-पत्र जारी करवाए।
- इस पहचान-पत्र में रवांडा की जनता को तीन जातियों (हुतु, तुत्सी और तोवा) में बांटा गया।- विभाजन में हुतु समुदाय को रवांडा की उच्च जाति बताते हुए उन्हें सरकारी सुविधाएं देनी शुरू कर दीं।- इससे तुत्सी समुदाय भड़क उठा। इसके बाद ही दोनों समुदायों के बीच अक्सर हिंसक झड़प शुरू हो गई।
- पश्चिमी देशों की मध्यस्था से 1962 में रवांडा आजाद हुआ और एक देश बना।- 1973 में हुतु समुदाय के ‘हेबिअरिमाना’ रवांडा के प्रेसिडेंट बने। 6 अप्रैल 1994 को उनके प्लेन पर हमला हुआ, जिसमें उनकी मौत हो गई। यही घटना रवांडा के नरसंहार का कारण बनी। इस जनसंहार में रवांडा की लगभग 20 प्रतिशत जनसंख्या खत्म हो गई थी।कई महिलाएं अब भी अपने बच्चें को नहीं मानतीं सगा- नरसंहार में हत्या-रेप की वीभत्स घटनाओं ने यहां की आबादी के बड़े हिस्से को बुरी तरह प्रभावित किया।- आज भी हजारों महिलाएं एड्स से पीड़ित हैं। वहीं कई महिलाएं जन्म दिए बच्चे को अपना नहीं मानतीं।- उनका मानना है कि ये उन दरिंदो की संतानें हैं, जिन्होंने उनके पूरे परिवार को बेरहमी से कत्ल कर दिया था।
- हालांकि, अब देश के हालात धीरे-धीरे सुधर रहे हैं। कई देशों की समाज सेवी संस्थाएं यहां काम कर रही हैं।
- वर्तमान सरकार को भी पश्चिमी देशों से आर्थिक मदद मिल रही है, जिससे कि देश का विकास हो सके।
100 दिन में ही यहां बिछा दी गई थीं 10 लाख लाशें
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